हिमाचल में मंत्रियों की सरकारी गाड़ियों पर लगी ब्रेक, नई योजनाओं और भर्तियों पर रोक; जानें क्या बदलेगा?

हिमाचल प्रदेश में नगर निकाय चुनावों की घोषणा के साथ ही शहरी क्षेत्रों में आदर्श आचार संहिता प्रभावी हो गई है। अब सरकार न तो नई योजनाओं का शिलान्यास कर पाएगी और न ही नई भर्तियों के विज्ञापन निकाल सकेगी। मंत्रियों और विधायकों द्वारा सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। यह पाबंदियां चुनाव प्रक्रिया पूरी होने तक जारी रहेंगी।
Himachal Pradesh Model Code Of Conduct Guidelines Urban Local Body Elections Restrictions
Himachal Pradesh Model Code Of Conduct Guidelines Urban Local Body Elections Restrictions
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​शिमला: हिमाचल प्रदेश में नगर निकाय चुनावों की रणभेरी बजते ही राज्य के शहरी इलाकों की तस्वीर बदल गई है। राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव की तारीखों के औपचारिक एलान के साथ ही 'आदर्श आचार संहिता'(Model Code of Conduct) लागू हो गई है। इसका सीधा अर्थ यह है कि अब शासन और प्रशासन की बागडोर एक तरह से चुनाव आयोग के अदृश्य नियंत्रण में आ गई है। यह व्यवस्था इसलिए लागू की जाती है ताकि सत्ता पक्ष अपने रसूख या सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल मतदाताओं को लुभाने के लिए न कर सके। अगले कुछ हफ्तों तक सरकार कोई भी ऐसा बड़ा फैसला नहीं ले पाएगी, जिससे चुनावी निष्पक्षता पर सवाल खड़े हों।

आचार संहिता के लागू होते ही सबसे बड़ा असर राजनेताओं की कार्यशैली पर पड़ा है। अब मुख्यमंत्री से लेकर कैबिनेट मंत्री, विधायक और विभिन्न बोर्डों व निगमों के चेयरमैन या वाइस चेयरमैन चुनाव प्रचार के लिए सरकारी गाड़ियों, पायलट वाहनों या सरकारी अमले का उपयोग नहीं कर पाएंगे। नियमों के मुताबिक, आधिकारिक दौरों को चुनावी दौरों के साथ नहीं जोड़ा जा सकता। यदि कोई राजनेता चुनावी सभा में जाता है, तो उसे निजी वाहन का ही उपयोग करना होगा। आयोग ने स्पष्ट किया है कि सरकारी बंगलों या विश्राम गृहों (Rest Houses) का उपयोग राजनीतिक गतिविधियों या चुनाव कार्यालय के रूप में करना भी वर्जित होगा।

शहरी निकायों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले वार्डों में अब सरकार किसी भी नई योजना की घोषणा नहीं कर सकेगी। वर्तमान में चल रहे प्रोजेक्ट्स का काम जारी रह सकता है, लेकिन किसी नए काम का टेंडर जारी करना या शिलान्यास करना पूरी तरह प्रतिबंधित है। यहां तक कि पुराने पूरे हो चुके प्रोजेक्ट्स का उद्घाटन भी चुनाव प्रक्रिया पूरी होने तक टालना होगा। राज्य निर्वाचन आयोग ने साफ किया है कि कोई भी ऐसा वित्तीय लाभ या अनुदान घोषित नहीं किया जाएगा, जो सीधे तौर पर वोट बैंक को प्रभावित करता हो। इससे सरकार के लोकलुभावन वादों पर फिलहाल पूरी तरह 'लॉक' लग गया है।

प्रशासनिक स्तर पर भी बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। आचार संहिता के दौरान नई भर्तियों के विज्ञापन जारी करने पर रोक रहती है। यदि कोई भर्ती प्रक्रिया पहले से चल रही है, तो उसके परिणाम घोषित करने या नियुक्ति पत्र देने के लिए आयोग से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य हो सकता है। इसी तरह, अधिकारियों और कर्मचारियों के तबादलों (Transfer-Posting) पर भी रोक लगा दी गई है। विशेष परिस्थितियों में यदि तबादला जरूरी है, तो राज्य निर्वाचन आयोग की हरी झंडी के बिना फाइल आगे नहीं बढ़ेगी। यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि कोई भी अधिकारी किसी विशेष दल या उम्मीदवार को फायदा न पहुंचा सके।

राज्य निर्वाचन आयुक्त अनिल खाची ने सभी जिलाधिकारियों (DC) और पुलिस अधीक्षकों (SP) को निर्देश दिए हैं कि वे अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में आचार संहिता का अक्षरशः पालन सुनिश्चित करें। सरकारी भवनों, दीवारों या बिजली के खंभों पर लगे राजनीतिक पोस्टरों और होर्डिंग्स को हटाने का काम भी शुरू कर दिया गया है। आयोग ने हिदायत दी है कि किसी भी सरकारी कर्मचारी को चुनाव प्रचार का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। यदि कोई कर्मचारी किसी दल विशेष के पक्ष में काम करता पाया जाता है, तो उसके खिलाफ तत्काल अनुशासनात्मक और कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण में आयोग ने बताया है कि वर्तमान में आचार संहिता केवल उन शहरी क्षेत्रों (ULBs)में लागू है जहां चुनाव होने हैं। राज्य के ग्रामीण इलाकों में अभी जनजीवन और सरकारी कामकाज सामान्य रूप से चल सकता है। हालांकि, यह राहत बहुत कम समय के लिए है। जैसे ही राज्य निर्वाचन आयोग पंचायत चुनावों की तारीखों का एलान करेगा (जो कि एक सप्ताह के भीतर संभावित है), वैसे ही पूरे प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में भी आचार संहिता प्रभावी हो जाएगी। तब तक के लिए सरकार के पास ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों को गति देने का एक छोटा सा अवसर बचा है। आचार संहिता केवल सरकार या उम्मीदवारों के लिए ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों और मतदाताओं के लिए भी एक संदेश है। यह समय है जब मतदाताओं को बिना किसी प्रलोभन या दबाव के अपने विवेक से प्रतिनिधि चुनने का अवसर मिलता है। किसी भी तरह की शराब, नकदी या उपहार बांटने की जानकारी मिलने पर नागरिक सीधे निर्वाचन कार्यालय को सूचित कर सकते हैं। नगर परिषद और पंचायतों के लिए 19 मई और नगर निगमों के लिए 31 मई तक यह कड़े नियम प्रभावी रहेंगे, जिसके बाद ही प्रशासनिक कामकाज फिर से अपनी सामान्य रफ़्तार पकड़ेगा।